रिश्तों की अनमोल कहानी,गढ़ते हैं धागे
रिश्तों की अनमोल कहानी, गढ़ते हैं धागे।
हर धड़कन की अनुपम भाषा,पढ़ते हैं धागे।
दम्भी लम्पट अत्याचारी, खींच न पाते हैं।
साड़ी के उस टुकड़े का भी,मान निभाते हैं।
मौन सभा पर मुखर तमाचे, जड़ते हैं धागे।
रसाताल में जाकर के भी , बाली जीत गया।
तीन लोक को जीते जी भी,कड़वा घूँट पिया।
लक्ष्मी जी को प्रभु मिलते जब, बंधते हैं धागे।
विपद काल को सम्मुख देखे,चितौडी रानी।
संकट के बादल दूर हटें, हारे अभिमानी।
स्वाभिमान की रक्षा करने, अड़ते हैं धागे।
मेघ गर्जना करके निकले, वे मगरूर हुए।
विश्व विजेता के सपने भी,यहां पर चूर हुए।
पुरु के घर उसकी भार्या के ,बढ़ते हैं धागे।
देशभक्ति का पाठ पढ़ाना, गुरुकुल परिपाटी।
रहे सुरक्षित सीमा रेखा,हर पर्वत घाटी।
मातृ भूमि की बलिबेदी पर,चढ़ते हैं धागे।
बहुत खूब सर जी👏👏
जवाब देंहटाएंअद्भुत
जवाब देंहटाएंशानदार सृजन
जवाब देंहटाएंहार्दिक आभार आपका
हटाएंबहुत सुंदर रचना
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