मुक्ति(कहानी)

 *मुक्ति*

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         (एक हकीकत पर आधारित कथा)


आज अनुपम बड़ी प्रसन्न थी साढ़े छः महीने के घोर शारिरिक कष्ट सहने के उपरांत ऑपरेशन कक्ष में जाते हुए अपने पति प्रवीण से कहा था-

"मैं जल्दी ठीक होकर वापिस आऊँगी, आज मुझे घोर शारिरिक पीड़ा से मुक्ति मिल जाएगी।"

प्रवीण इतना कह सका-

"मैं तुम्हारी प्रतीक्षा करूँगा अन्नू।"

हाथ हिलाते हुए अनुपम अंदर चली गयी।

प्रवीण के मन में हर्ष और विषाद के मिश्रित भाव जन्म ले रहे थे। असमंजस इस बात का था कि बच्चा कम दिनों का  होने के कारण बचेगा या नहीं। इन साढ़े छः महीनों में केवल अनुपम ने कष्ट ही नहीं झेले थे बल्कि उसने भी अपना तन मन धन सब कुछ दाँव पर लगा दिया था। अनुपम भी इस पीड़ा को झेलकर ऊब चुकी थी।  डॉक्टर के द्वारा उसे पूर्णतया बेडरेस्ट ही बताया था। आखिर बेडरेस्ट भी कितने दिन कर सकती थी, उससेउकता चुकी थी।

अनुपम के लिये यह पीड़ा असहनीय थी तो प्रवीण के लिये भी कष्टकारक हो चुकी थी।

 आज सुबह ही डॉ ने सलाह दी थी

"अनुपम का अभी ऑपरेशन करना ही श्रेयस्कर होगा अन्यथा दोनों से जोखिम उठाना उठाना पड़ सकता है।"

जब मूल सुरक्षित हो तब तो ब्याज की ज्यादा चिंता नहीं करनी चाहिए। शायद यही सोचकर प्रवीण ने कहा था-

" हाँ डॉक्टर साहब  यही उचित रहेगा।"

भगवान के द्वारा दिये गए प्रसाद को ही स्वीकार करना चाहिए अथवा जिसके भाग्य में जो लिखा है उससे बढ़कर ज्यादा की आस करना भी समझदारी से परे है, लेकिन कोशिश करने के बाबजूद भी फल प्राप्ति की संभावना न हो सन्तुष्टि ही सर्वोपरि उपाय होता है। इन्हीं विचारों की श्रंखला में मन डूबा हुआ था अनुपम का।अपनी सम्पूर्ण कोशिश जिसमें शारिरिक मानसिक कष्ट भी शामिल हैं के बाबजूद आज शायद संघर्ष से हार मानकर ही मुक्ति अंतिम उपाय सूझा था इसीलिए आपरेशन थियेटर की इर बढ़ते हुए मुक्ति के सम्बंध में अपने पति को समझाते हुए कहा था।

"जिस उद्यान को माली प्रतिदिन पानी से सींचकर पूर्ण विकसित व सुगन्धित पुष्पों की परिकल्पना करता है उसमें कुछ पुष्प पूर्व से खिलखिला रहें हों एवं नए पुष्प की खिलने की आशा हो तो सभी आशाएं स्वाभविक रूप से उस पर टिकी होती हैं। लेकिन यदि उस पर तुषारापात की संभावना हो  तो माली उन 'दो' पुष्पों के सहारे जीने का मन बनाता है और धीरे धीरे वह स्थिति प्रत्यक्षतः आती है कि तीसरे पुष्प की  परिकल्पना मन से निकालकर दो पुष्पों पर केंद्रित हो जाती है तथा इन्हीं के सहारे जीवन काटने का अभ्यास बनाता है।

रह रह कर इस प्रकार के विचारपुंज अनुपम के मन में उठ रहे थे। इसीलिए डाक्टर के द्वारा  लगाए गए इंजेक्शन का एहसास  भी नहीं हुआ था। क्योंकि मन तो आज केशव एवं शालू पर प्यार लुटाने को उद्यत हो रहा था जो कि उसके उद्यान में दो पुष्पों के रूप में खिलखिला रहे थे।

मुक्ति की आकांक्षा मन को उद्देलित कर रही थी और अगले उस क्षण की प्रतीक्षा थी जब इस चिकित्सालय की चार दीवारी से बाहर निकल कर अपने हँसते खेलते उद्यान में मुक्त पंक्षी की तरह  विचरण करेगी । विचारों का चक्र इतनी तेजी से घूम रहा था कि वे आपस में ही टकराकर स्वयं ही भस्मीभूत हो रहे थे। इन विचारों का चक्र एकाएक थम चुका था क्योंकि उस इंजेक्शन का प्रभाव अनुपम पर पूरी तरह हो चुका था।

'अनुपम, अनुपम ---' कई बार डाक्टर ने पुकारा लेकिन कोई जबाब न पाकर आश्वत हो गया और अपने कार्य को अंजाम देने में लग गया।

पास में खड़ी नर्स भी बड़ी फुर्ती के साथ अपने डॉक्टर का सहयोग कर रही थी और डॉक्टर भी पूर्ण मनोयोग से अपने लक्ष्य की ओर बढ़ रहा था। पूर्व रिपोर्ट के आधार पर यह ज्ञात था कि रक्त में हीमोग्लोबिन उस मात्रा में नहीं है जितना होना चाहिए,इसीलिए चार यूनिट रक्त की पहले से ही व्यवस्था कर ली थी। ऊपर टँगी हुई बोतल से एक एक बूँद नली के द्वारा अनुपम के स्नायुतंत्र में प्रवाहित हो रही थी।

सफल शल्य क्रिया के द्वारा बच्ची को बाहर निकाला जा चुका था।  कम दिनों की होने के कारण उसके बचने की समस्या नगण्य थी। फिर 'जब तक साँस है तब तक आस है।' के सिद्धांत  को अपनाते हुए उसे मशीन पर रखने हेतु भेजा जा चुका था।

बच्ची को बाहर निकालते हुए ही नर्स से डॉक्टर ने कहा प्रवीण को फोन मिलाओ शीघ्र ही। नर्स ने फौरन फोन मिलाकर स्पीकर पर डाल दिया । फोन उठते ही नर्स ने प्रवीण से कहा लो डॉक्टर साहब से बात करो।

'हाँ प्रवीण  इस समय हमारे पास समय काफी कम है ध्यान से सुनो। अनुपम ने इतने दिनों तक कष्ट झेला है। इसलिए इनकी ओवरी इंफेक्टिड हो चुकी है। भविष्य में खतरा बना रहेगा इसलिये इसे अभी आसानी से निकाला जा सकता है।"

कहते हैं जब खतरा साक्षात सिर पर खड़ा हो, भविष्य की कठिनाइयां दिखाई दे रही हो तो उससे बचने का उपाय भी वर्तमान में करना ज्यादा श्रेयस्कर होता है। इन्हीं सब परेशनियों से बचने में लिये प्रवीण ने डॉक्टर से कहा था।

''डॉक्टर साहब आपको जो ठीक लगे वह करो हमारी अनुपम के लिए।''

"इट्स ओके प्रवीण।"

दूसरे ऑपरेशन हेतु फोन पर मिली सहमति के आधार पर  डॉक्टर ने औपचारिता पूर्ण की । रक्त चाप और ह्रदय की धड़कन की को भी नॉर्मल पाकर बिल्कुल आश्वत होकर डॉक्टर बड़ी तन्मयता से अपने कार्य मे संलग्न हो गया। जैसे जैसे डॉक्टर ओवरी को निकाल रहा था। वैसे वैसे ह्रदय की धड़कन भी कुछ मन्द हो रही थी । ओवरी को निकालने में सफलता मिल गयी किन्तु ह्रदय की धड़कन  एक दम रुक गयी। डाक्टर के चेहरे से हवाइयां उड़ गई। तुरन्त ही कृत्रिमत स्वांस के लिये ऑक्सीजन लगाई गई। ऑपरेशन थियेटर से सीधे वेंटिलेटर पर। लेकिन बहुत देर हो  चुकी थी। 

इधर प्रवीण बड़ी बेसब्री से  डॉक्टर के इंतजार में चहल कदमी कर रहा था। मन में विभिन्न प्रकार की आशंकाएं जन्म ले रही थी मन बैठा जा रहा था।

तभी डॉक्टर आता हुआ दिखाई दिया।

"अनुपम कैसी है डॉक्टर साहब।"

"अनुपम अभी वेंटिलेटर पर है कुछ कहना अभी जल्दबाजी होगी। थोड़ी देर में अपडेट मिल जाएगी।"

डॉक्टर की भाव भंगिमा को देखकर प्रवीण का मन आशंकित हो रहा था। इसी आशंका में प्रवीण के मुख से कुछ ऐसे शब्द प्रस्फुटित हुये जिनमें हकीकत का स्वर था, तभी अपनी माँ के कंधे पर सिर रखकर प्रवीण ने कहा था

"मम्मी अनुपम नहीं रही।"

माँ ने ढाँढस बंधाते हुए कहा-

"ऐसा नहीं सोचते हैं बेटा, डाक्टर साहब प्रयास कर रहे हैं। सब ठीक हो जायेगा।"

डॉक्टर को भी उस परम सत्य का आभास हो गया था जिसके समक्ष  सभी को नत होना पड़ता है। तभी  तो उसने आकर  कहा था ।

अनुपम को इस सांसारिकता से मुक्ति मिल गयी है।"

वातावरण में केवल रुदन की आवाजें आ रही थी।


डॉ राजीव पाण्डेय

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